प्रभु मिलन की प्यास माधव जल की पियास न जाइ । जल महि अगनि उठी अधिकाइ ।। तू जलनिधि हउ जल का मीनु । जल महि रहउ जलहि बिनु खीनु ।। तू प...

Thirst of Meeting with The God प्रभु मिलन की प्यास

Thirst of Meeting with The God प्रभु मिलन की प्यास

प्रभु मिलन की प्यास माधव जल की पियास न जाइ ।

Thirst of Meeting with The God प्रभु मिलन की प्यास

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प्रभु मिलन की प्यास

माधव जल की पियास न जाइ । जल महि अगनि उठी अधिकाइ ।।
तू जलनिधि हउ जल का मीनु । जल महि रहउ जलहि बिनु खीनु ।।
तू पिंजरू हउ सूअटा तोर । जमु मंजारू कहा करै मोर ।। 
तू तरूवरू हउ पंखी आहि । मंदभागी तेरो दरसनु नाहि ।।
तू सतगुरू हउ नउतनु चेला । कहि कबीर मिलु अंत की बेला ।।
                                                                              (राग गउड़ी—2)


अर्थ :— 
      हे माधव (ईश्वर) जल अर्थात तुमसे मिलन की प्यास जाती ही नहीं है। जल में और अधिक अग्नि धधकती है। अर्थात यह प्यास बढ़ती ही जाती है। तू जल का अथाह स्रोत हो और मैं उसमें रहने वाला मछली हूं। फिर भी प्यासी हूं। अर्थात् यह सारा जगत ईश्वर का बनाया हुआ है फिर भी हम उस ईश्वर के दर्शन से अछूते हैं। तुम पिंजरा हो तो मैं उसमें रहने वाला तोता (सुअटा) हूं। यम रूपी बिल्ली (मंजारू) मेरा क्या बिगाड़ेगी। तुम वृक्ष हो तो मैं उसपर रहने वाला पक्षी हूं। फिर भी मैं वो मन्दभाग्य वाला हूं जो तेरा दर्शन नहीं होता। तुम सत्गुरू हो और मैं तुम्हारा नवीन चेला हूं। कबीर साहेब कहतें हैं कि हे ईश्वर अंत समय में मुझे मिल जाओ।

                                                             साहेब बन्दगी—3

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