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ई माया रघुनाथ की बौरी, खेलन चली अहेरा हो। चतुर चिकनिया चुनि चुनि मारे, कोई न राखेउ नेरा हो।। मौनी बीर दिगंबर मारे, ध्यान धरंते जोगी हो। ...
माया
A blog about greatest sant Kabir Das. It include satsang, Kabir Das ke Bhajan, Kabir ke Dohe, Ram, geet, shabd paths, moksha and many more.
चतुर चिकनिया चुनि चुनि मारे, कोई न राखेउ नेरा हो।।
मौनी बीर दिगंबर मारे, ध्यान धरंते जोगी हो।
जंगल में के जंगम मारे, माया किनहु न भोगी हो।।
बेद पढंते, बेदुआ मारे, पूजा करते स्वामी हो।
अर्थ बिचारत पंडित मारे, बाँधेउ सकल लगामी हो।।
शृंगी ऋषि बन भीतर मारे, शिर ब्रह्मा का फोरी हो।
नाथ मछंदर चले पीठि दे, सिंगलहू में बोरी हो।।
साकट के घर करता धरता, हरि भगता की चेरी हो।
कहँहि कबीर सुनो हो संतो, ज्यों आवै त्यौं फेरी हो।।
अवधू भूले को घर लावै, सो जन हमको भावै। घर में जोग भोग घर ही में, घर तजि बन नहिं जावै।। बन के गए कल्पना उपजै, तब धों कहाँ समावै। घर में भ...
अवधू भूले को घर लावै
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घर में जोग भोग घर ही में, घर तजि बन नहिं जावै।।
बन के गए कल्पना उपजै, तब धों कहाँ समावै।
घर में भुक्ति मुक्ति घर ही में, जो गुरू अलख लखावै।।
सहज सुन्न में रहै समाना, सहज समाधि लगावै।
उनमुनि रहै ब्रह्म को चीन्है, परम तत्त को ध्यावै।।
सुरति निरत सो मेला करि कै, अनहद नाद बजावै।
घर में बस्तु बस्तु में घर है, घर ही बस्तु मिलावै।।
कहैं कबीर सुनो हो अवधू ज्यों का त्यों ठहरावै।।
संतो पांडे निपुण कसाई। बकरा मारि भैंसा पर धावै , दिल मँह दर्द न आई।। करि अस्नान तिलक दै बैठे , विधि से देवि पुजाई। आतम राम पलक में बिनसे , ...
कलि के विदूषक
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निर्विकार निर्भय तू ही और सकल भय मांहि। सब पर तेरी साहिबी तुझ पर साहिब नाहि।। साहब से सब होत है बन्दा से कछु नाहि। राई से पर्वत करे प...
साहब
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मन लागा मेरे यार फकीरी में। जो सुख होत हैं राम भजन में, सो सुख नाहिं अमीरी में।। भला बुरा सबका सुनि लीजै, कर गुजरान गरीबी में। आखिर तो म...
मन लागा मेरे यार फकीरी में
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भक्तिदान गुरू दीजिए, देवन के देवा। चरण कमल बिसरौं नहीं, करिहौं पद सेवा। तीरथ व्रत मैं ना करूं, नहिं देवन पूजा। तू ही ओर निरखत रहूं, कोई...
भक्तिदान
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भक्तिदान गुरू दीजिए, देवन के देवा।
चरण कमल बिसरौं नहीं, करिहौं पद सेवा।
तीरथ व्रत मैं ना करूं, नहिं देवन पूजा।
तू ही ओर निरखत रहूं, कोई और न दूजा।।
सुख संपति परिवार धन, सुंदर वर—नारी।
सपनेहूं इच्छा ना उठे, रहे ध्यान तुम्हारी।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि है, बैकुंठ विलासा।
सो सब कछु नहिं चाहिए, मेरे समरथ दाता।।
धर्मदास की विनती, साहब सुनि लीजै।
दरशन दीजै पट खोलि के, आपन करि लीजै।।
अपने अवसान की ओर अग्रसर यह वर्ष अनेक ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है। भारत को एक बार पुन: विश्व कप का स्वाद चखाने वाली है यह वर्ष। अनेक घो...
नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएं
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मन रे हरि भजि, हरि भजि, हरि भजि भाई। जा दिन तेरो कोई नांहीं, ता दिन राम सहाई।। तन्त ना जानूं मंत ना जानूं, जानूं सुन्दर काया। मीर मलिक छ...
हरि भजन
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जा दिन तेरो कोई नांहीं, ता दिन राम सहाई।।
तन्त ना जानूं मंत ना जानूं, जानूं सुन्दर काया।
मीर मलिक छत्रपति राजा, ते भी खाये माया।।
वेद न जानूं भेद ना जानूं, जानूं एक ही रामा।
पंडित दिसि पछियारा कीन्हां, मुख कीन्हौं जित नामा।।
राजा अंबरिक कै कारणि, चक्र सुदर्शन जारै।
दास कबीर कौ ठाकुर एैसो, भगत की शरण ऊबारै।।
हमारे गुरू करूणा सिंधु कबीर। अशरण शरण करण मुद मंगल, हरण सकल भव भीर।। जीव उद्धारण कारण प्रगटे, जग में धारि शरीर। मीर वजीर देखि भय माने, फक...
करूणा सिंधु कबीर
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अशरण शरण करण मुद मंगल, हरण सकल भव भीर।।
जीव उद्धारण कारण प्रगटे, जग में धारि शरीर।
मीर वजीर देखि भय माने, फक्कड़ वेश फकीर।।
शाह सिकन्दर कसनी लीन्हा, करि बहु विधि तदवीर।
नहिं वश चले हारि तव चरणन, आई पड़े आखीर।।
वीर बघेला के सद्गुरू हैं, बिजली खाँ के पीर।
हिन्दु—मुसलमान दोउ की, तोरी भरम जंजीड़।।
धर्मदास कहें और कौन हैं, अस समरथ मति धीर।
मगहर सूखी नदी बहाए, आमी अमृत नीर।।
हमारे गुरू.........................
संतो राह दूनो हम दीठा। हिन्दू तुरूक हटा नहिं मानै, स्वाद सभन को मीठा।। हिन्दू व्रत एकादसी साधै, दूध सिंघारा सेती। अन्न को त्यागै मन को न ...
हिन्दू तुरूक की एक राह है
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हिन्दू तुरूक हटा नहिं मानै, स्वाद सभन को मीठा।।
हिन्दू व्रत एकादसी साधै, दूध सिंघारा सेती।
अन्न को त्यागै मन को न हटकै, पारन करै सगौती।।
तुरूक रोजा नमाज गुजारै, बिस्मिल बांग पुकारै।
इनको भिस्त कहाँ ते होवै, सांझे मुर्गी मारै।।
हिन्दू की दया मेहर तुर्कन की, दोनों घट सौं त्यागी।
ये हलाल वै झटका मारै, आगि दूनो घर लागी।।
हिन्दू तुरूक की एक राह है, सतगुरू सोई लखाई।
कहहिं कबीर सुनो हो संतो, राम न कहेउ खुदाई।।
हरि बिनु कउन सहाई मन का। मात पिता भाई सुत बनिता, हित लागो सब फन का। आगे कउ किछु तुलहा बांधहु, किआ भरवासा धन का। कहा बिसासा इस भांडे का, ...
इक आसरा तेरा
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मात पिता भाई सुत बनिता, हित लागो सब फन का।
आगे कउ किछु तुलहा बांधहु, किआ भरवासा धन का।
कहा बिसासा इस भांडे का, इतनकु लागै ठनका।
सगल धरम पुंन फल पावहु, धुरि बांधेहु समजन का।
कहै कबीर सुनहु रे संतहु, इहु मन उड़न पंखेरू बन का।
मोको कहाँ ढूंढ़े बन्दे मैं तो तेरे पास में। ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकान्त निवास में। ना मैं जप में ना मैं तप में ना मैं व्रत उपास मे...
भगवान की तलाश
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मोको कहाँ ढूंढ़े बन्दे मैं तो तेरे पास में।
ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकान्त निवास में।
ना मैं जप में ना मैं तप में ना मैं व्रत उपास में।
ना मैं किरिया करम में रहता, नहीं योग सन्यास में।
नहीं प्राण में नहीं पिण्ड में, ना ब्रहृमाण्ड अकाश में।
ना मैं भृकुटि भँवर गुफा में, सब स्वासन की श्वास में।
खोजी होय तुरत मिल जाऊँ, इक पल की ही तलाश में।
कहहिं कबीर सुनो भाई साधो, मैं तो हूं विश्वास में।
दया गरीबी बंदगी, समता शील विचार। हैं लक्षण ये संत के, कहें कबीर पुकार।।
ओउम्
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हैं लक्षण ये संत के, कहें कबीर पुकार।।













